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बारामुला में शहीद हुए हरियाणा के सूबेदार हीरालाल, अकबरपुर गांव में तिरंगा यात्रा के साथ दी जाएगी अंतिम विदाई

उत्तरी कश्मीर के बारामुला में पेट्रोलिंग के दौरान शहीद हुए महेंद्रगढ़ के सूबेदार हीरालाल का पार्थिव देह आज उनके पैतृक गांव अकबरपुर पहुंचेगा। पूरे सैन्य सम्मान के साथ दी जाएगी अंतिम विदाई।

  • कश्मीर के बारामुला में गश्त के दौरान खाई में गिरने से सूबेदार हीरालाल की शहादत
  • 23 साल की बेदाग सेवा के बाद देश के लिए कुर्बान हुआ हरियाणा का लाल
  • शहीद के सम्मान में अकबरपुर गांव में निकलेगी विशाल तिरंगा यात्रा
  • बुजुर्ग पिता और पढ़ाई कर रहे बच्चों को छोड़ गए अपने पीछे, पूरे गांव में शोक की लहर

Haryana News: उत्तरी कश्मीर की उन बर्फीली और पथरीली ऊंचाइयों से एक ऐसी खबर आई है जिसने हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के एक छोटे से गांव अकबरपुर की धड़कनें रोक दी हैं। भारतीय सेना की राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात सूबेदार हीरालाल अब हमारे बीच नहीं रहे। शुक्रवार की शाम जब सूरज ढल रहा था, तब बारामुला के दुर्गम पहाड़ी इलाके में गश्त करते हुए देश का यह जांबाज सिपाही खाई में गिरने की वजह से शहादत को गले लगा बैठा।

खबर मिलते ही अकबरपुर की गलियों में सन्नाटा पसर गया है लेकिन इस सन्नाटे में एक गर्व भी छिपा है। वह गर्व जो केवल एक शहीद के गांव को ही नसीब होता है।

फिसलन भरी राहें और अटूट कर्तव्य

आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए जानी जाने वाली राष्ट्रीय राइफल्स की ड्यूटी आसान नहीं होती। शुक्रवार को भी सूबेदार हीरालाल अपने साथियों के साथ एक बेहद संवेदनशील इलाके में पेट्रोलिंग पर थे। कश्मीर की ये पहाड़ियां जितनी सुंदर दिखती हैं उतनी ही बेरहम भी हैं। गश्त के दौरान अचानक एक फिसलन भरे रास्ते पर पैर क्या डिगा, मानो पूरे परिवार का आधार ही डगमगा गया। संतुलन बिगड़ने से हीरालाल गहरी खाई में जा गिरे और मौके पर ही उन्होंने अंतिम सांस ली।

वे महज एक सैनिक नहीं थे बल्कि अपनी यूनिट के उन अनुभवी स्तंभों में से एक थे जिन पर सेना को अटूट भरोसा था। साल 2000 में जब उन्होंने फौज की वर्दी पहनी थी तभी से देश सेवा ही उनका धर्म बन गई थी।

परिवार का ढांढस और अधूरी उम्मीदें

घर पर 88 साल के बुजुर्ग पिता हरिराम अपने बेटे की राह तक रहे थे। उम्र के इस पड़ाव पर अक्सर तबीयत नासाज रहती थी, तो बेटे का सहारा ही सबसे बड़ी लाठी थी। पत्नी रोशनी देवी के लिए तो जैसे पूरी दुनिया ही उजड़ गई। शहीद हीरालाल अपने पीछे एक बेटा और एक बेटी छोड़ गए हैं। बेटा गजेंद्र आईआईटी पुणे में भविष्य गढ़ रहा है तो बेटी स्नेहलता दिल्ली में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही है।

बच्चों की आंखों में पिता के लिए जो सपने थे, वे अब आंसुओं में बह रहे हैं। हीरालाल की मेहनत ही थी कि एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर उनके बच्चे देश के प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंचे।

अकबरपुर देगा अपने नायक को अंतिम विदाई

शनिवार की सुबह अकबरपुर की सुबह आम नहीं होगी। उम्मीद जताई जा रही है कि सुबह करीब 10 बजे जब तिरंगे में लिपटा हुआ उनका पार्थिव शरीर गांव की मिट्टी को छुएगा तो हर आंख नम होगी। ग्रामीणों ने फैसला किया है कि वे अपने वीर सपूत को किसी आम तरीके से विदा नहीं करेंगे। पूरे गांव में एक विशाल तिरंगा यात्रा निकाली जाएगी।

जब सेना की टुकड़ी उन्हें अंतिम सलामी देगी तो वह मंजर सिर्फ गम का नहीं बल्कि उस बहादुरी का उत्सव भी होगा जो सूबेदार हीरालाल ने अपनी 23 साल की सर्विस के दौरान दिखाई।

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