IMF की सख्ती और सरकारी खर्च: पाकिस्तान क्यों फंसता जा रहा है आर्थिक जाल में
एक नई रिपोर्ट ने चेताया है कि IMF के तहत लागू सख्त नीतियों और बढ़ते सरकारी खर्च के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक लो-ग्रोथ ट्रैप में फंस सकती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ रहा है।
- महंगाई का बोझ, IMF की सख्ती और पाकिस्तान की फंसी अर्थव्यवस्था
- टैक्स बढ़े, राहत घटी, आम लोग सबसे ज्यादा प्रभावित
- रिपोर्ट का दावा: सियासी खर्च खुले, जनता पर कर्ज और महंगाई
- आने वाले सालों तक ग्रोथ पर ब्रेक लगने की चेतावनी
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था एक ऐसे दौर में फंसती दिख रही है, जहां आगे बढ़ने की गुंजाइश कम और बोझ बढ़ता जा रहा है। एक नई रिपोर्ट ने चेताया है कि मौजूदा नीतियों के चलते देश लंबे समय तक लो-ग्रोथ ट्रैप में फंसा रह सकता है। खास बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया की कीमत आम पाकिस्तानियों को चुकानी पड़ रही है जबकि सरकारी खर्च पर कोई ठोस लगाम नहीं दिखती।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2022 के बाद से लागू की गई नीतियां अंतरराष्ट्रीय कर्ज कार्यक्रमों के तहत सख्त मानी जा रही हैं, लेकिन उनका असर बेहद असमान रहा है। टैक्स बढ़ाए गए, सब्सिडी कम की गई लेकिन सरकार के अपने खर्च में वैसी कटौती नजर नहीं आई जैसी आम जनता से उम्मीद की गई।
टैक्स और कटौतियों का दबाव
रिपोर्ट के मुताबिक बीते कुछ सालों में बड़े पैमाने पर टैक्स और लेवी लगाई गईं। पेट्रोलियम लेवी से लेकर अन्य अप्रत्यक्ष करों तक, सरकार ने राजस्व जुटाने का सबसे आसान रास्ता चुना। नतीजा यह हुआ कि वही लोग ज्यादा दबाव में आए जो पहले से टैक्स के दायरे में थे।
इस दौरान टैक्स बेस बढ़ाने की बात तो हुई, लेकिन व्यवहार में उसका असर नहीं दिखा। पुराने टैक्सपेयर्स और नियमों का पालन करने वाले कारोबारियों पर ही अतिरिक्त बोझ डाल दिया गया। इससे कई छोटे और मझोले व्यवसाय बंद होने लगे रोजगार के अवसर घटे और बाजार की रफ्तार धीमी पड़ती गई।
खर्च पर सवाल, सियासत पर मेहरबानी
रिपोर्ट एक और गंभीर सवाल उठाती है। कहा गया है कि जहां एक ओर जनता से त्याग की उम्मीद की गई, वहीं दूसरी ओर सरकारी और राजनीतिक खर्च में खुलकर बढ़ोतरी हुई। विकास खर्च के नाम पर फंड बढ़ाए गए जिन्हें सत्ता से जुड़े हितों को मजबूत करने का जरिया बताया गया है।
नई गाड़ियों के बेड़े, बड़े विदेशी दौरे, दफ्तरों और सरकारी आवासों पर भारी खर्च जैसे उदाहरण सामने रखे गए हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि ऑस्टेरिटी केवल कागजों और आम लोगों तक सीमित रही।
गरीबी और बेरोजगारी की गहरी चोट
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे गहरा असर समाज के निचले और मध्य वर्ग पर पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार बेरोजगारी बढ़ी है, उद्योग सिमटे हैं और अनुमान है कि देश की लगभग आधी आबादी अब गरीबी रेखा के नीचे जीवन जी रही है। यह स्थिति अर्थव्यवस्था में स्थायी घाव छोड़ सकती है जिसे भरने में सालों लग सकते हैं।
IMF की भूमिका पर उठे सवाल
रिपोर्ट में International Monetary Fund की भूमिका पर भी तीखे सवाल उठाए गए हैं। या तो संस्थान इन नीतियों का जानबूझकर समर्थन कर रहा है, या फिर आम नागरिकों के हितों की अनदेखी कर रहा है। दोनों ही स्थितियों में जवाबदेही तय करने की मांग की गई है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है। अगर नीतियों में बुनियादी बदलाव नहीं हुआ और टैक्स सुधार के साथ सरकारी खर्च पर ईमानदार नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक दबाव में रहेगी। और इस दबाव का सबसे बड़ा भार हमेशा की तरह आम लोगों के कंधों पर ही पड़ेगा।



